आश्ना
ये कुछ रातें उन तमाम रातों पर उधार रहीं जो तुम्हारे बिना काटनी हैं
नज़्मों का घर
ये कुछ रातें उन तमाम रातों पर उधार रहीं जो तुम्हारे बिना काटनी हैं
ये रात और तुमदोनों मुझे पागल करते होमिले हुए हो न दोनों?
1. दिन में आशिक़ी रात को काम करता हूँपागल हूँ बे सिर पैर के काम … Read more
तुमसे बात करने के बादएक रख दिया था खिड़की के पासकुछ को बुकशेल्फ़दो-चार को फ़्रिज … Read more
प्यार बिना बुलाया कैंसर नहीं है। पहली बात ये कैंसर नहीं है। कैंसर फिर भी … Read more
हिन्दू की बस्ती में मुसलमान डरा हुआ हैमज़हब की बस्ती में ईमान डरा हुआ हैशक़, … Read more